उत्तर प्रदेश चुनाव मुद्दा

उत्तर प्रदेश चुनाव का मुख्य मुद्दा – हिंदुत्व – ध्वस्त हुए जातीय समीकरण

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव २०२२ की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। किसकी जीत होगी और कौन हारेगा इसका नतीजा तो 10  मार्च को पता चलेगा। परन्तु चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों की तैयारियों जोरों पर है। हालॉंकि अभी किसी राजनितिक दल ने अपने घोषणा पत्र जारी नहीं किये है, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव मुद्दा क्या होंगे इसकी झलक दिखने लगी है।

भाजपा गठबंधन जहाँ विकास, संस्कृति, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दों पर जोर दे रही है वहीं विपक्षी दल रोजगार, कानून-व्यवस्था, कोरोना नियंत्रण आदि मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। जहाँ बीजेपी खुलकर अपने हिंदुत्व के मुद्दे को उठा रही है वही विपक्षी दल भी हिन्दुओं को साधने की कोशिश करते नजर आ रहे है। जिसका उदहारण मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना, यानि अपने विधानसभा क्षेत्र में किसी एक स्थल को चुनकर उसका विकास करने में, में देखने को मिला।

इस योजना के तहत हर विधायक को अपने विधानसभा क्षेत्र के एक पर्यटन स्थल को चुनना और उसका सौंदर्यीकरण करना शामिल है। 373 विधानसभा क्षेत्रों के प्रतिनिधियों में ज्यादातर विधायकों ने हिंदू धार्मिक स्थलों को सौंदर्यीकरण के लिए चुना। यहाँ हैरानी की बात यह है कि इन विधायकों में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के विधायक भी शामिल हैं। अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते है कि जो पार्टियां हमेशा मुस्लिम-दलित वोटों को लुभाने की कोशिश करती थी, इस बार बहुसंख्यक हिन्दुओं को क्यूँ आकर्षित करना चाह रही है।

आखिर क्यूँ तेज़ हुई हिंदुत्व के मुद्दे की बात

इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीती में चर्चा का मुख्य विषय चचाजान, अब्बा जान, जिन्ना, मदरसा, अयोध्या, काशी और मथुरा है। इन शब्दों का राजनीतिक मंच से खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। जहाँ इन शब्दों के प्रयोग से भाजपा अपनी चुनावी जमीन को मजबूत कर रही है वहीं विपक्षी इसके फेर में फंस कर रह गए है।

“हिंदुत्व” आखिर चुनावों में इस मुद्दे को किसने उठाया? अगर लोगों से इस सवाल को पुछा जाए तो अधिकतर लोग भाजपा का नाम लेंगें। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। इस बार हिंदुत्व के मुद्दे को उठाने का श्रेय विपक्षी पार्टियों को जाता है। जिसकी शुरुवात की समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने जब उन्होंने अपने एक बयान में मोहम्मद अली जिन्ना की तुलना महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और पटेल से की। इसके बाद कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की किताब, जिसमें हिंदू संगठनों के लिए विवादित टिप्पणी की गई है, और राशिद अल्वी के हिन्दुओं पर किया विवादित बयानों ने आग में घी का काम किया।

इन घटनाओं ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर हिंदुत्व के मुद्दे की तरफ मोड़ दिया। जिसका फायदा निश्चित ही भाजपा को मिलेगा। जहाँ इन मुद्दों को लेकर भाजपा विपक्ष पर हावी हो रही है वहीं इस मुद्दों ने विपक्षियों की नींदे हराम कर दी है।

उत्तर प्रदेश चुनाव मुद्दा – हिंदुत्व के मुद्दे से किसको लाभ

भाजपा शुरू से ही खुद को हिन्दुओं की पार्टी के रूप में स्थापित करती आयी है। जिसकी झलक भाजपा द्वारा किये कार्यों में साफ़ दिखती है। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा बाकी दलों से मजबूत स्थिति में है। अगर यह मुद्दा जोर पकड़ता है तो उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा और सपा ही आमने-सामने होंगे। ऐसा इसलिए भी क्यूंकि कांग्रेस और बसपा की छवि हिन्दुओं के समक्ष बहुत अच्छी नहीं है। इस दोनों दलों ने हमेशा से ही दलितों और मुसलमानों का समर्थन पाने के लिए हिन्दुओं को अपमानित किया है।

उत्तर प्रदेश चुनाव में जातीय समीकरण को ध्वस्त कर देगा – हिंदुत्व का मुद्दा

उत्तर प्रदेश चुनावों में जहाँ भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही अपने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दों को लेकर आगे बढ़ रही है। वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपने जातीय समीकरण के दम पर चुनाव लड़ती आयी है। सपा जहाँ एम-वाई (मुस्लिम + यादव) के समीकरण से चुनाव लड़ती है। वहीं बहुजन समाज पार्टी डी-एम (दलित+मुस्लिम) के समीकरण से चुनाव लड़ती है। कांग्रेस भी लगभग इन्हीं समीकरणों का अनुसरण करती है।

लेकिन 2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो या 2019 का लोकसभा चुनाव, इन दोनों चुनाव में भाजपा ने हिन्दुओं और हिंदुत्व के मुद्दे की दम पर बहुमत से जीत दर्ज करी। इन चुनावों ने राजनितिक पार्टियों को हिन्दुओं के प्रति अपनी सोच बदलने पर मजबूर कर दिया। वार्ना एक वक्त था जब भारत की तमाम राजनीतिक पार्टियां अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण पर जोर दिया करती थी। लेकिन भाजपा से अपनी करारी हार के बाद अब राजनितिक पार्टियां हिंदुत्व को महत्त्व देने लगी है।

बहुत संभव है कि इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावों में सभी दल हिन्दुओं को लुभाने की कोशिश करें। लेकिन भाजपा को चाहने वाले हिन्दू निश्चित ही राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के लिए भाजपा को ही वोट देंगें। उत्तर प्रदेश का हिन्दू अब जातीय बंटवारे से ऊपर उठकर हिंदुत्व और विकास के महत्व को समझ गया है। विकास और हिंदुत्व के मुद्दे पर उनकी पहली पसंद निश्चित ही भाजपा है।

विपक्षी दलों द्वारा हिन्दुओं को लुभाने की नाकाम कोशिश

हमेशा से ही अल्संख्यकों और मुसलमानों के तुष्टिकरण में लगी राजनीतिक पार्टियां अब हिन्दुओं को लुभाने को कोशिश करती नजर आती है। पहले जहाँ हिन्दुओं के खिलाफ बोलने पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती थी। अब वहीं ऐसा कुछ भी करने या कहने पर पार्टी आलाकमान इनके खिलाफ कार्यवाही करने लगा है।

जिसका ताज़ा उदहारण आपको समाजवादी पार्टी में देखने को मिलेगा। समाजवादी पार्टी के समाजवादी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पद पर तैनात लोटन राम निषाद ने भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा दिया था। उन्होंने कहा था, ‘अयोध्या में राम मंदिर बने या कृष्ण मंदिर उससे मुझे कोई लेना देना नहीं है। मेरी आस्था उनमें है जिनकी वजह से मुझे सीधा लाभ मिला। मैं बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, महात्मा ज्योतिबा फुले और छत्रपति शाहूजी महाराज को अपनी आस्था मानता हूं।’ अपने इस बयान पर उनको अखिलेश यादव की नाराजगी झेलनी पड़ी और अपने पद से भी हाथ धोना पड़ा था।

इसके अलावा कांग्रेस और बसपा भी अपने विधायकों और उम्मीदवारों को बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का पूरा ख्याल रखने की नसीहत देते हुए दिखाई देते है। अब उनका हर विधायक हिंदुत्व के झंडे को लेकर अपने विधानसभा क्षेत्र में घूम रहे है। लेकिन विपक्षी पार्टियों का यह ढकोसला कितना कामयाब होगा इसका पता तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा।

उत्तर प्रदेश का हिन्दू आखिर किसके साथ?

‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ भाजपा ने अपने इस संकल्प को अयोध्या में राम मंदिर बना के सिद्ध कर दिया। इसके अलावा वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम का सौंदर्यीकरण, मिर्जापुर में माँ विन्ध्यवाशिनी मंदिर का सौंदर्यीकरण, 373 विधानसभाओं में हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण से लेकर मथुरा में कृष्ण मंदिर के निर्माण के अपने संकल्प के साथ, भाजपा ने खुद को एक हिन्दू पार्टी के रूप में स्थापित किया है। वही पिछले विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा न करके भाजपा ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति को ठेंगा दिखाया है।

इसके अलावा पिछले पांच सालों में एक भी सांप्रदायिक दंगों का न होना, हिन्दुओं का पलायन रुकना, पलायन कर गए हिन्दुओं की घर वापसी, अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आना आदि ऐसे बहुत से कार्य है जिनके द्वारा भाजपा ने अपनी हिंदूवादी छवि को और सुदृढ़ किया है। इसके अलावा भाजपा सरकार ने प्रदेश के चौमुखी विकास के लिए बहुत कारगर कदम उठाये है। ऐसा करके भाजपा ने हिन्दुओं के मन में अपनी एक अलग ही जगह बना ली है।

उत्तर प्रदेश में अत्याचार, कुप्रशासन और भेदभाव से पीड़ित हिन्दुओं को भाजपा के रूप में एक मजबूत विकल्प मिला है। निश्चित ही प्रदेश के हिन्दू अपने इस विकल्प को वापस सत्ता में देखना चाहेंगे। इसीलिए ये कहना बिलकुल गलत नहीं होगा की उत्तर प्रदेश का हिन्दू एकजुट होकर भाजपा का समर्थन करना नजर आ रहा है।

 

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