दीपावली शुभ मुहूर्त

दिवाली पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र, सामग्री लिस्ट: दीपावली 2022

दीपावली जिसे दिवाली भी कहा जाता है शरद ऋतु में मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिन्दू त्यौहार है। यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्यौहार दिन सोमवार, 24 अक्टूबर 2022 को मनाया जायेगा। धनतेरस के तीसरे दिन मनाया जाने वाला यह त्यौहार भारत का सबसे बड़ा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्यौहार है। जानें क्या है दिवाली पूजा विधि और दिवाली शुभ मुहूर्त ।

दीपवाली दीपों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। इसे दीपोत्सव भी कहते है। आध्यात्मिक रूप से दीपावली “अन्धकार पर प्रकाश की विजय” को दर्शाता है। इस त्यौहार को सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते है। सिख समुदाय इसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाते है। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के ‘मोक्ष दिवस’ के रूप में मनाते है। वहीं बौद्ध धर्म के लोग हिन्दुओं की तरह माता लक्ष्मी की पूजा करके इस पर्व को मनाते है।

दीपावली असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। दीपावली अंधकार को भगाकर प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। इस दिन लोग अपने घरों, दुकानों आदि को सजाते और दीपक जलाते है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश जी की पूजा की जाती है। नवरात्री की दसवीं तिथि के बीस दिन बाद दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है।

दीपावली 2022 में किस दिन मनाई जाएगी

धनतेरस से लेकर पांच दिनों तक चलने वाला दिवाली का त्यौहार भारत में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। दीपवाली का त्यौहार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में अमावस्या की रात में मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्यौहार दिन सोमवार, 24 अक्टूबर 2022 को मनाया जायेगा।

दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त, दिवाली पूजा विधि, सामग्री लिस्ट और पूजा करने का समय

दिवाली पर माँ लक्ष्मी पूजा

दिवाली का त्यौहार माँ लक्ष्मी जी को समर्पित है। इस दिन धन की देवी माता लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है। हिन्दू धर्म में माँ लक्ष्मी को धन, वैभव और सुख-समृद्धि प्रदान करनी वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। दीपवाली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा समय नीचे दिया हुआ है।

दीपावली तिथि प्रारंभ – सोमवार 24 अक्टूबर 2022 को शाम 05 बजकर 27 मिनट से
दिवाली तिथि समाप्त – मंगलवार 25 अक्टूबर 2022 को शाम 04 बजकर 18 मिनट पर
दीपवाली लक्ष्मी पूजा मुहूर्त प्रारम्भ –  सोमवार 24 अक्टूबर 2022 को शाम 06 बजकर 54 मिनट से
दिवाली लक्ष्मी पूजा मुहूर्त समापन – सोमवार 24 अक्टूबर 2022 को रात्रि 08 बजकर 16 मिनट तक
प्रदोष काल – शाम 05 बजकर 43 मिनट से रात्रि 08 बजकर 16 मिनट तक
वृषभ काल – शाम 06 बजकर 54 मिनट से रात्रि 08 बजकर 50 मिनट तक

दिवाली पर माँ लक्ष्मी की पूजा विधि और सामग्री में क्या-क्या होना चाहिए

दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी, भगवान श्री गणेश और माँ सरस्वती की पूजा का विधान है। विधिवत दिवाली पूजा सम्पन्न करने के लिए आप माँ लक्ष्मी, भगवान गणेश और माँ सरस्वती की प्रतिमा, रोली, कुमकुम, अक्षत, पान, सुपारी, नारियल, लौंग, इलाइची, धुप, मिट्टी के दीपक, शुद्ध घी, गंगाजल, गुड़, दही, शहद, साफ़ रुई, घनिया, पंच श्रृंगार, पंचमेवा, पंचामृत, फल, फूल, जौ, गेंहू, चन्दन, दूध, खील, बताशे, जनेऊ, श्वेत और लाल वस्त्र, कलावा, इत्र, चौकी, कलश, कमल के फूल, शंख, आसन, पूजा की थाली, चांदी का सिक्का आदि पहले से ही एकत्र करके रख लें।

दिवाली के दिन माँ लक्ष्मी की पूजा कैसे करें व दिवाली पूजा विधि

दीवाली के दिन माँ लक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा पूरे विधि विधान से करनी चाहिए। माँ लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल को सबसे उत्तम माना गया है। दीपवाली के दिन सबसे पहले उठकर घर की साफ़ सफाई करें। पूरे घर में गंगाजल छिड़ककर घर को स्वस्छ करें। इसके बाद घर के मुख्य द्वार और आँगन को रंगोली, दीपकों और सजावट की सामग्री से सजाएँ।

घर के पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और उसपर साफ़ लाल कपड़ा बिछाकर माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की मूर्ती स्थापित करें। चौकी के पास शुद्ध जल से भरा एक कलश रखें। माँ लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ती पर तिलक लगाकर दीपक जलाएं। इसके बाद अक्षत, फल, पान, सुपारी, पुष्प, गुड़, मेवे, श्रृंगार, हल्दी, रोली, कुमकुम आदि अर्पण करें। इसके बाद महालक्ष्मी की स्तुति करें।

तत्पश्चात देवी सरस्वती, माँ काली, भगवान विष्णु और कुबेर देव की विधिवत पूजा अर्चन करें। सभी देवताओं को मिष्ठान का भोग लगाएं। पूजा विधि के दौरान माँ लक्ष्मी जी की आरती और मन्त्रों का जाप करना चाहिए। माँ लक्ष्मी की पूजा पूरे परिवार के साथ करनी चाहिए। महालक्ष्मी की पूजा के बाद तिजोरी, बहीखाते और व्यापारिक उपकरणों की पूजा करें। पूजा के उपरांत सभी लोग माँ लक्ष्मी का प्रसाद ग्रहण करें। पूजा समाप्ति पर श्रद्धा अनुसर जरुरतमंदों को मिठाई और दक्षिणा दें।

दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी का पृथ्वी पर आगमन

हिन्दू पुराणों के अनुसार, कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात में माँ लक्ष्मी भूलोक पर विचरण करने आती है। विचरण के दौरान माँ लक्ष्मी हर पृथ्वी वासी के घर में जाती है। इस दौरान जो घर हर प्रकार से स्वच्छ और प्रकाशवान रहता है, वहां माँ लक्ष्मी अंश रूप में ठहर जाती है। इसीलिए दीपावली के पर्व पर घर की साफ़-सफाई, अंधकार को दूर भागने के लिए दीपक जलाने और विधि विधान से माँ लक्ष्मी की पूजा करने का प्रचलन है। जो लोग इस दिन नियमों का पालन करते है, माँ लक्ष्मी की उनपर विशेष कृपा होती है।

दिवाली के पर्व और शुभ मुहूर्त पर क्या करना चाहिए

दीपावली पर कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए। मान्यता है की ऐसा करने व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और उसे माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

  • कार्तिक अमावस्या के दिन प्रातःकाल शरीर पर तेल की मालिश करने के बाद ही स्नान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से धन की हानि नहीं होती है।
  • दीपवाली के दिन परिवार के सभी लोगों को उपवास का पालन करना चाहिए। रात्रि में पूजा के उपरांत ही भोजन करना चाहिए। बच्चे और वृद्धजन या शारीरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को उपवास से छूट रहती है।
  • लक्ष्मी पूजन के उपरांत हमें अपने पूर्वजों की भी पूजा करनी चाहिए। उन्हें धूप और भोग अर्पण करना चाहिए। प्रदोष काल के समय हाथ में दीपक या अग्नि की रोशनी में पितरों को मार्ग दिखाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।
  • दीपवाली के रात पूरे परिवार को एकत्र होकर माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। उसके उपरांत सभी को गीत, भजन आदि गाना चाहिए और घर में उत्सव मनाना चाहिए। ऐसा करने से घर में व्याप्त दरिद्रता दूर होती है। घर में उत्सव का माहौल देखकर माँ लक्ष्मी आपके घर रह सकती है।

दीपावली के त्यौहार का महत्त्व क्या है

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, हिन्दू धर्म में दीपावली का आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों रूपों में विशेष महत्त्व है। शास्त्रों में दीवाली को आध्यात्मिक अंधकार पर आतंरिक प्रकाश, असत्य पर सत्य, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व बताया गया है। पौराणिक समय से ही हिन्दू समाज में दीपावली के अवसर पर किसी भी कार्य के शुभारंभ और नई वस्तु खरीदने का प्रचलन है।

उपनिषदों में कहा गया है “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात (हे भगवान!) मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाइए। दीवाली की रात दीपों का प्रकश इसी अंधकार को भागने को दर्शाता है। यह पर्व लोगों में नई खुशियों का संचार करता है। उन्हें अपने अंदर की बुराई को हराने की प्रेरणा देता है। लोग अपने परिवार, मित्रों और रिश्तेदारों के साथ इस उत्सव को बहुत ही हर्षोउल्लास के साथ मनाते है।

दीपवाली से जुडी पौराणिक कथाएं

दिवाली के शुभ मुहुर्त पर अयोध्या वापसी

दीवाली से बहुत सी पौराणिक और आधुनिक कहानिया जुडी हुई है। इनमें से कुछ का वर्णन नीचे किया गया है।

श्रीराम के वनवास से अयोध्या लौटने की खुशी में दीपोत्सव का आयोजन और वही से दिवाली पूजा का प्रारम्भ हुआ

हिंदू धर्म में दिवाली का पर्व भगवान श्रीराम के वनवास से लौटने की ख़ुशी में मनाया जाता है। रामायण अनुसार, दासी मंथरा के गलत विचारों से भ्रमित होकर भरत की माता कैकई राजा दशरथ को श्रीराम को वनवास भेजने के लिए वचनबद्ध कर देती है। श्रीराम अपने पिता के आदेश को मानते हुए अपनी पत्नी और भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास काटने निकल पड़ते है।

वनवास के दौरान लंकापति रावण माता सीता का हरण कर लेता है। माता सीता को वापस न करने की स्थिति में श्रीराम और रावण में भयंकर युद्ध होता है। यह युद्ध पूरे नौ दिन चलता है। अंत में दशहरा के दिन श्रीराम रावण का वध करके माता सीता को छुड़ा लेते है। इस समय तक वनवास की अवधि पूरी हो जाती है। तब श्रीराम बीस दिन की यात्रा पूरी करके अपने राज्य अयोध्या वापस लौटते है। श्रीराम के वापस आने की खुशी में पूरे राज्य को दीपों से सजाया जाता है। अयोध्यावासी मंगल गीत गाते है और उत्सव मनाते है। माना जाता है  इसी दिन दिवाली के पर्व और पूजा की शुरुआत हुई।

पांडवों का वनवास पूरा करके अपने राज्य वापस लौटने पर

हिन्दू महाग्रंथ महाभारत के अनुसार, कौरवों ने शकुनि मामा की मदद से छल से शतरंज के खेल में पांडवों का सबकुछ छीन लिया था। साथ ही पांडवों को तेरह वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा। पांचों पांडव कार्तिक अमावस्या के दिन तेरह वर्ष का वनवास पूरा करके अपने राज्य वापस लौटे थे। उनके लौटने की ख़ुशी में राज्य के लोगों ने दीप जला कर उत्सव मनाया था।

भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा राक्षस नरकासुर का वध करने पर

राक्षस नरकासुर प्रागज्योतिषपुर नगर, आज के दक्षिण नेपाल का एक प्रान्त, का राजा था। नरकासुर ने अपनी शक्ति से इंद्रा, वायु, अग्नि, पवन  आदि देवताओं को आतंकित कर दिया था। नरकासुर इतना उद्दंड हो गया था कि उसने संतों की सोलह हजार स्त्रियों का अपहरण करके बंदी बना लिया था। नरकासुर के आतंक से मुक्ति पाने के लिए सभी देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से मदद की गुहार लगाई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध करके देवताओं और संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इसी खुशी में लोगों ने अगले दिन कार्तिक मास की अमावस्या को अपने घरों में दीपक जलाये और उत्सव मनाया। मान्यता है की तभी से नरक चतुर्दशी और अगले दिन दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है।

माँ लक्ष्मी का सृष्टि में अवतरित होना

मान्यता है कि समुन्द्र मंथन के दौरान कार्तिक मास की अमावस्या को माँ लक्ष्मी ने सृष्टि में अवतार लिया था। माता लक्ष्मी धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। माता लक्ष्मी ने अवतरित होकर सभी देवतावों को उनका वैभव वापस लौटाया था। देवता माँ लक्ष्मी की कृपा से प्रफुल्लित होकर माँ लक्ष्मी की पूजा की और दीप जलाए। तब से इस दिन माता लक्ष्मी के पूजन का विशेष महत्त्व है। दीपावली मनाने का एक मुख्य कारण यह भी है।

सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था

राजा विक्रमादित्य प्राचीन भारत के एक महान सम्राट थे। राजा विक्रमादित्य बहुत ही आदर्श राजा थे, उन्हें उनकी उदारता, साहस तथा विद्वानों के संरक्षण के लिए हमेशा याद किया जाता है। कार्तिक अमावस्या के दिन उनका राज्याभिषेक हुआ था। इसकी खुशी में पूरी प्रजा ने घरों में दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। राजा विक्रमदित्त्य मुगलों से लोहा लेने वाले अंतिम हिन्दू सम्राट थे।

सिखों के 6वें गुरु को आजादी का मिलना

अत्याचारी मुग़ल बादशाह जहांगीर ने सिखों के 6वें गुरु हरगोविंद सिंह सहित 52 राजाओं को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया हुआ था। गुरु हरगोविंद सिंह जी को कैद करने के बाद से ही जहांगीर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा। मानसिक प्रताड़ना से बचने के लिए जहांगीर ने गुरु हरगोविंद जी को आज़ाद करने का निर्णय लिया। परन्तु हरगोविंद जी ने अपने साथ कैद किये 52 राजाओं को भी रिहा करनी की मांग रखी। इस मांग को जहांगीर ने मान लिया और गुरु हरगोविंद जी के साथ सभी 52 राजाओं को भी रिहा कर दिया गया। अपने गुरु को मिली आज़ादी के कारण सिख समुदाय इस दिन खुशियां मनाता है।

दिवाली को महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मानना

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मानते है। महावीर स्वामी को कार्तिक अमावस्या के दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इन्ही कारणों से जैन धर्म इस पर्व को मनाता है। हालाँकि जैन धर्म की दिवाली पूजा विधि पूर्णत: भिन्न है।

गौतम बुद्ध के घर वापसी की ख़ुशी में

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध धर्म प्रचार करके 17 वर्ष बाद अपने अनुयायिओं के साथ अपने नगर कपिलवस्तु वापस लौटते है। उनके स्वागत में नगरवासी लाखों दीप जलाते है और उत्सव मानते है। तब महात्मा बुद्ध ने “अप्पों दीपो भव” का उपदेश दिया था। तब से लेकर अबतक बौद्ध धर्म के लोग दीपवाली का त्यौहार मानते आ रहे है।

अगले पांच साल दिवाली का त्यौहार कब-कब मनाया जायेगा

दीपावली तिथि अगले पांच सालो में

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