Ayurveda Benefits

आयुर्वेदिक उपचार के लाभ – एक जीवनशैली – Ayurveda Benefits

पिछले कई दशकों से विशेषज्ञों के बीच इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि कौन सी चिकत्सा पद्धति ज्यादा
लाभदायक और असरदार है। ये कहना मुश्किल है कि क्या कभी भी इस विषय पर निष्पक्ष होकर तथ्यों के साथ विश्व
मंच पर बहस की गई हो। विभिन्न पद्धतियों को अनुसरण करने वाले अपनी अपनी चिकत्सा पद्धति को ही सही
ठहराते है। अभी हाल ही में भारत में एक बार फिर आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच बहस छिड़ गई है की कौन बेहतर
है। शायद ये बहुत काम लोग ही जानते होंगे की भारत में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का अनुसरण पिछले ५०००
वर्षो से हो रहा है। भारत में एलोपैथी का आगमन हाल की ही सदी में हुआ है। जहाँ आयुर्वेद बीमारी के कारणों का
पता लगाके उसके जड़ का नाश करता है वही एलोपैथ में सिर्फ बीमारी का इलाज होता है जिससे बीमारी तो ठीक हो
जाती है परन्तु उसके कारक शरीर में मौजूद रह जाते है, जो आगे चलके बीमारी को फिर उभार सकते है। ऐसे अनेको
अनेक कारण है जिससे दोनों पद्धतियों में अंतर कर सकते है। परन्तु आज हम इस बहस में न पड़कर की कौन सी
चिकत्सा पद्धति बेहतर है आईये हम अपनी प्राचीन आयुर्वेदिक चिकत्सा पद्धति की कुछ विशेषताओं पर बात करते है।

१. स्थायी इलाज(Permanent Solution) – आयुर्वेदिक चिकत्सा में व्यक्ति की बीमारी का स्थाई इलाज किया जाता है और उसके शरीर से
बीमारी से समबंदित सभी विषाणुओं का अंत कर दिया जाता है। इसमें बीमारी के साथ साथ उसके मुख्य श्रोत का
पता करके उसका भी इलाज किया जाता है। जिससे व्यक्ति का शरीर विषाणु रहित होकर स्वस्थ हो जाता और वो
एक स्वस्थ जीवन जीता है।


२. पार्श्व प्रभाव (No Side Effect) – आयुर्वेदिक दवाईओं को पूरी तरह से प्राकृतिक जड़ी बूटियों से बनाई जाती है जो
प्राकृतिक तरीके से बीमारी का निवारण करती है बिना कोई पार्श्व प्रभाव छोड़े। आयुर्वेद की सभी दवायें प्रकृति में
मिलने वाले फलों, जड़ी बूटी, पेटों के छाल आदि के उद्धरण से तैयार की जाती है जो कोई भी पार्श्व प्रभाव नहीं
छोड़ती है। आयर्वेदिक दवाओं का सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक के देखरेख में बिना किसी साइड इफ़ेक्ट के डर के
इस्तेमाल कर सकता है।


३. पुरानी बिमारियों का सफल इलाज (Chronic Disease) – आयुर्वेदिक चिक्तित्सा पद्धति में पुरानी से पुरानी
बीमारी का सफल इलाज संभव है। आयुर्वेदिक दवाओं से खासकर पेट, जिगर और गुर्दे से जुड़ी पुरानी बिमारियों में
रामबाण की तरह असर करती है। आयुर्वेदिक औषधि जिगर और गुर्दे का जीर्णोद्धार का देती है जिससे आदमी फिर से
एक स्वस्थ जीवन जी सकता है। किसी और पद्धति से इलाज करने पर वो सिर्फ बीमारी का इलाज करते है पर उनके
कारण हमेशा बने रहते है। आयुर्वेद ऐसी बिमारियों का पूर्ण इलाज सिर्फ आयुर्वेद में ही संभव है।


४. रासायनिक सामग्री से मुक्त(No Chemical) – आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में किसी भी तरह का रस्याण इस्तेमाल नहीं होता है।
आयुर्वेदिक दवाई शुद्ध रूप से प्राकृतिक पदार्थो से बनाई जाती है। दवाई बनाने की किसी भी प्रक्रिया में रसायनो का
प्रयोग नहीं होता है। पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से बनी होने के कारन ये दवाएं किसी भी प्रकार का पार्श्व प्रभाव नहीं
छोड़ती।


५. बीमारी का जड़ से नाश(Works on Root) – आयुर्वेदिक पद्धति में बीमारी का जड़ से इलाज किया जाता है। इस चिक्तिसा पद्धति में
बीमारी के कारणों का पता लगाके उसका इलाज किया जाता है जिससे न सिर्फ वो बीमारी बल्कि उसके प्रभावित
होने वाले अंगो को भी पूर्णता स्वस्थ कर देते है। आयुर्वेदिक चिकत्सा से पीलिया, बवासीर और कब्ज जैसी बिमारियों
का जड़ ने खात्मा हो जाता है।


६. कम खर्चीला इलाज(Less Expensive) – आयुर्वेदिक दवाई प्राकतिक पदार्थो से बनी होने की वजह से कम कीमत पर मिलती है। इस
पद्धति में इलाज थोड़ा लम्बा चलता है पर इस चिकत्सा पद्धति से न केवल बीमारी अपितु उसके लक्षणों से पूर्णता
निदान मिलता है।

७. पेशा या सेवा(Social work) – आयुर्वेदिक चिकिस्ता पद्धति अभ्यास करने वाले लोगों का उपचार सेवा भाव के साथ करते है। इस
पेशे से जुड़े लोग बीमार का इलाज पैसे से ज्यादा सेवाभाव से करते है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करने
वाले न सिर्फ बीमारी बल्कि व्यक्ति को एक स्वस्थ जीवन देने की भी प्रेणना देते है।


८. दर्शन – आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति एक दर्शन का पालन करता है और जो कहता है कि एक अच्छा और स्वस्थ
जीवन सबका अधिकार है। एक अच्छे और स्वस्थ स्वास्थ्य के लिए मनुष्य के तीन दोषों यानि वात, पित्त, और कफ़ के
बीच संतुलन होना जरुरी है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति न्हो को ध्यान में रख कर बीमारी का इलाज करती है।


९. पर्यावरण के अनुकूल (Environment Friendly) – आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में किसी भी चरण पे रसायनो का प्रयोग नहीं होता है। इसकी
सभी दवाइयों का निर्माण पूर्ण रूप से प्राकृतिक पदार्थो से बनाया जाता है। प्राकृतिक पदार्थो से बने होने की वजह से
ये पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचते है।


१०. वजन घटाने और रखरखाव – आयुर्वेदिक चिकित्सा में ज्यादा वजह को एक बीमारी के रूप में नहीं देखा जाता है
अपितु इसे आपके खानपान के तरीके से जोड़ा जाता है। आयुर्वेद में मोटापे को काम करने के लिए अनावश्यक दवाओं
के बजाये व्यक्ति के खानपान को नियंत्रित करने पर ध्यान देती है। आयुर्वेद व्यक्ति को संतुलित आहार लेने और आहार
योजना का दृढ़ता से पालन करने को कहती है। अगर व्यक्ति आयुर्वेद के द्वारा निर्धारित आहार योजना का नियमित
पालन करता है तो वो बिना दवाओं के ही अपना वजन काम कर सकता है।


उपर्युक्त फायदों के अलावा आयुर्वेद का पालन करने से अनगिनत लाभदायक परिणाम होते है। आयुर्वेद न सिर्फ एक
चिकित्सा पद्धति है बल्कि ये जीवन जीने की एक कला है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के कुछ मूल नियमों का उल्लेख है
जो इस प्रकार है – व्यक्ति को अपना नास्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए, रात को हल्का खाना खाना चाहिए, रात में न
ही ज्यादा देर से सोना चाहिए और न ही सुबह देर तक सोना चाहिए, खूब पानी पिएं, जहा तक हो सके शाकाहारी
भोजन का सेवन करें, नियमित व्ययाम या योग करें, ध्रूमपान और मदिरा के सेवन से बचे और एक सक्रिय जीवन
शैली अपनाये। अगर आप आयर्वेद के निम्न सिद्धांतो का कड़ाई से पालन करते है तो आपको जल्दी कोई बीमारी छू भी
नहीं सकती।

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